Friday, February 26, 2010

वास्तविकता


बार बार हर बार
दिल को बहलाती हूँ मैं 
जो सोच रही वो सही नहीं 
ये ही बतलाती हूँ मैं ।
पर जिंदगी हरदम मुझे 
ये ही समझती है । 
जो वास्तविकता है
उसे तू क्यूँ झूठलाती है ।
जिंदगी से बस
इतना ही कहती हूँ मैं ।
अच्छा है अपने सपनों की 
दुनिया में रहती हूँ मैं । 
वास्तविकता को अगर माना 
तो कैसे जी पाऊंगी,
जिंदगी को गीत बनाकर
कैसे फिर गाऊँगी ???


जिंदगी को गीत बनाकर
कैसे फिर गाऊँगी ???:):)

8 comments:

  1. Very nice poem di.........heart touching

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  2. very good shweta. never knew u were such a good poet!!!!!!

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  3. bahut badhiya shweta ji,,,,mujhe pata nahi tha aap v bloger hai,,,,,,
    comment ka jabab comment se de diya maine,,,,hahahaa

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  4. bhaut upyogi or informtive . bihar ka kala -koshal ke jankari ke liye sadhuvaad .
    kavitain man/anter ko vyakt kertii hain .

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